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केएम अग्रवाल की रचनाधर्मिता अनुकरणीय: प्रो. जनार्दन

महराजगंज। उन्यासी (79) साल की उम्र में केएम अग्रवाल द्वारा अनवरत लेखन करना और कोविड काल से लेकर अबतक तीन साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन करवाना अपने आप में महराजगंज की धरती को गौरवान्वित करने वाला है। इस उम्र में लेखन शुरू करके श्री अग्रवाल ने जीवन जीने की जो शानदार युक्ति तलाशी है, वह अनुकरणीय है।
यह विचार गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. जनार्दन धामिया के हैं। वे शनिवार को यहां आयोजित वरिष्ठ पत्रकार केएम अग्रवाल के सद्य: प्रकाशित उपन्यास ‘रूपमती की डायरी’ के लोकार्पण समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ, महराजगंज ने किया था।
सबसे पहले लेखक के एम अग्रवाल ने उपन्यास के कुछ अंश का पाठ किया, जिसका सबने करतल ध्वनि से स्वागत किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में शुमार रहे पी जी कॉलेज राजनीति विज्ञान के प्रो. इनामुल्लाह सिद्दीकी ने कहा कि सामाजिक सरोकारों से सतत जुड़ाव से श्री अग्रवाल को लिखने पढ़ने की ऊर्जा मिलती है। डा. परशुराम गुप्त ने अपने संबोधन में इस उपन्यास की चर्चा करते हुए श्री अग्रवाल को अपनी शुभकामनाएं दीं। जवाहरलाल पीजी कॉलेज के हिंदी विभाग के पूर्व प्राचार्य डा. महेश मणि बिहारी के एक दोहे का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उपन्यास सामाजिक विसंगतियों पर गहरी चोट करता है। वहीं डा. घनश्याम शर्मा ने उपन्यास की चर्चा करते हुए कहा एक लेखक के रूप में श्री अग्रवाल इस कृति के जरिए जो संदेश देना चाहते थे, उसमें सफल रहे हैं। प्रगतिशील लेखक संघ, उत्तर प्रदेश के मीडिया सचिव वरिष्ठ पत्रकार/साहित्यकार वीरेंद्र मिश्र दीपक ने अपने संबोधन में कहा कि इस कृति के जरिए लेखक ने समाज के विद्रूप चेहरे से न केवल परदा हटाया है, बल्कि उसका मुखौटा नोचने का सफल प्रयास भी किया है। लेखक का साहस प्रशंसनीय है। अन्य प्रमुख वक्ताओं में सी जे थामस, सुनील शुक्ल, संतोष श्रीवास्तव ने भी उपन्यास को इस धरती की उपलब्धि बताते हुए लेखक को बधाई दी। कार्यक्रम के आखीर में प्रगतिशील लेखक संघ, महराजगंज के अध्यक्ष डा. आर. के. मिश्रा ने आगतों के प्रति आभार प्रकट करते हुए इस कृति पर अलग से बातचीत करने की आवश्यकता जताई। संचालन देवेश पांडे ने किया l

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